Saturday, 23 April 2016

"साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ,कर्नल पुरोहित व स्वामी असीमानंद जैसे निर्दोष राष्ट्रवादियों को केवल मात्र "भगवा -आतंकवाद" शब्द ईजाद करने के लिए ही षड्यंत्र कर झूठा फंसाया गया था ! क्या ये तत्कालीन सत्ता के अहंकार में चूर ,वोट-बैंक तुष्टिकरण के सौदागरों का जाँच एजेंसियों को अपने हाथ की कटपुतली बनाने का अक्षम्यआपराधिक कृत्य नहीं था ?

काफी लंबी जांच-पड़ताल के  बाद पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के बारे में माननीय उच्चतम न्यायालय का निर्णय आया कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ऊपर मकोका लगाने का कोई भी कारण मौजूद नहीं है ! स्वामी असीमानंद के मामले में भी इतनी लंबी ट्रायल के बावजूद कुछ नहीं निकला है ! और अब कर्नल पुरोहित को भी जांच एजेंसियों से क्लीन चिट मिलने से ये तो स्पष्ट हो गया है कि ये राष्ट्रवादी निर्दोष थे और इनको एक षड्यंत्र के तहत झूठे मामले बना कर फंसाया गया था ! ये सब  सत्ता का दुरपयोग कर मानवीय अधीकारों को निर्ममता से कुचलने का मामला तो है ही साथ ही इससे हमारे देश की सुरक्षा व जांच एजेंसियों की  निष्पक्षता पर भी भयंकर प्रश्नचिंह लगा है और साथ में इसे भारतीय लोकतंत्रीय व्यवस्था को भी दागदार किया है ! इस मामले ने यह सिद्ध कर दिया है कि एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार भी यदि गलत नीति और नीयत पर चलने लगे तो वह अधिनायकवादी तरीके से स्थापित हुई सरकार से भी क्रूर और भयंकर साबित हो सकती है !

 शुरुआत में जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को फसाया गया तो यह प्रथम दृष्टया ही एक निर्दोष मामला लग रहा था ! हालांकि मैं स्वयं इससे पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को न तो जानता था और न ही  मैंने कभी उनका नाम सुना था !लेकिन जिस तरीके और उत्सुकता से तत्कालीन यूपीए सरकार ने उनको फसाया, जिस तरीके से पूरे जोर-शोर से प्रचारित करके उनके उपर मकोका लगाया, उसी समय आम जन को यह लगने लगा था कि कहीं ना कहीं दाल में कुछ काला है ! प्रज्ञा ठाकुर का कसूर केवल मात्र इतना था कि वह राष्ट्रवाद की प्रखर पुरोधा थी ! हैरानी की बात तो ये थी कि उनके ऊपर सारे देश में इससे पहले कोई भी अपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं था और न ही उनका किसी गलत संगठन से जुड़ाव रहा था, उसके बावजूद भी उनके ऊपर मकोका लगाकर जेल में ठूस देना व  उनके ऊपर जेल में अमानवीय अत्याचार करना, बीमार होने के बावजूद भी उचित इलाज की व्यवस्था ना करना, जेल के अंदर ही दूसरे खूंखार कैदियों के साथ उनको रखना व उनसे पिटाई करवाना, जेल कर्मी और पुलिसकर्मियों द्वारा अभद्र भाषा का प्रयोग कर दुर्व्यवहार करना ये सब उनको मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ने का ही एक आपराधिक कृत्य था !देश का कोई भी सभ्य नागरिक यह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा कौनसा भयंकर कृत्य साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने किया है जिस कारण से उनको इतनी बड़ी सजा दी जा रही है !मकोका आमतौर पर उन खूंखार आतंकवादियों पर लगाया जाता है जिनके बारे में यह आम धारणा प्रचलित है कि ये व्यक्ति राष्ट्र और समाज के लिए घातक है ! यंहा इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि मकोका क़ानून के तहत न जमानत मिल सकती है और न ही  गिरफ्तार किये गए व्यक्ति के खिलाफ सबूत दिखाने जरुरी है यानि बिना सबूत दिखाए व्यक्ति को कितने ही दिन जेल में रखा जा सकता है ! मकोका लगाने के बावजूद भी तत्कालीन सरकार की जांच एजेंसियां कोई भी ठोस सबूत  न तो सार्वजनिक तौर  पर और न ही किसी न्यायालय में पेश  कर पाई !यह सब बातें आम जनमानस को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रही थी!

 स्वामी असीमानंद को समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट के आरोप में जेल में ठूस दिया गया !स्वामी असीमानंद की आयु और उनके चरित्र को देखते हुए भारतीय समाज का कोई भी समझदार व्यक्ति यह कतई मानने के लिए तैयार नहीं था कि इस उम्र का व्यक्ति जिसने अपनी सारी जिंदगी समाज सुधार के लिए, समाज के कल्याण के लिए लगा दी हो वह  यात्रा कर रहे रेल यात्रियों को मारने का षड्यंत्र भी रच सकता है ! हाँ स्वामी असीमानंद जी ने एक अपराध तो किया था कि उन्होंने हिंदुओं के लिए शबरी-कुम्भ का आयोजन किया था जिसमे लगभग तीन लाख हिन्दु जिनको ईसाई-मशीनरीयों ने बहकाकर -फुसलाकर ईसाई धर्म में शामिल कर लिया था को दोबारा हिन्दू धर्म में शामिल किया था ! ईसाई- मशीनरियों के सालों के षड्यंत्र को नेस्तेनाबुद् करने का अपराध तो स्वामी जी ने किया था और ईसाई- मशीनरियों की योजना पुत्री सोनिया गान्धी की पार्टी ये सब कैसे सहन कर सकती थी !उसके बाद सेना में कार्यरत राष्ट्रवादी अधिकारियों का मनोबल तोड़ने हेतु कुछ दिनों बाद कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार किया गया और उन पर भी प्रखर हिंदू राष्ट्रवादी होने वह आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया! तब तक भी यह सारा माजरा किसी की समझ में नहीं आ रहा था तभी टीवी के  ऊपर तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम और कांग्रेस के वोटबैंक तुष्टीकरण के नए चेहरे दिग्विजय सिंह रोजाना जब "हिंदू आतंकवाद" -"हिंदू आतंकवाद "शब्द का प्रयोग करने लगे तो सारा मामला देश की जनता के समझ में आ गया कि इन राष्ट्रवादियों को जेल में ठूसने का असली प्रयोजन क्या था !

 क्या वोटों की खातिर राजनीती इतनी भी गिर सकती है ,इसका सर्वोत्तम उदाहरण उस समय की तत्कालीन कांग्रेस नीत यू पी ए सरकार ने प्रस्तुत किया था !चंद वोटों और सत्ता की निरन्तरता के लिए भगवा को ही आतंकवाद के साथ नत्थी कर दिया जाए ! "भगवा आंतकवाद '" शब्द का ईजाद करके क्या उन लाखों शहीदों व बलिदानियों का अपमान नहीं किया  गया जिन्होंने इस पवित्र भगवा की आन- बान और शान के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी ! सत्ता के नशे में चूर मदमस्त शासकों ने यह जरा भी गौर नहीं किया वो जाने अनजाने में  भारतीय संस्कृति और त्याग व बलिदान की भावना के प्रतीक भगवा पर कालिख पोत कर कितना बड़ा जघन्य अपराध कर रहे हैं ! इससे भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी एक बहुत बड़ा प्रश्नचिंह लगा कि सत्ता में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधि भी यदि अपनी ओछी  मानसिकता पर आ जाएं तो  वो अधिनायक तंत्र को भी वह माफ कर सकते हैं !इस देश में ऎसे हालात पैदा किए गए और एक समय ऐसे लगने लगा कि यह सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई तानाशाह सरकार है और जिस तानाशाही पूर्ण तरीके से उन्होंने वोट की खातिर हिन्दू राष्ट्रवादियों पर वार करना शुरू किया ,उससे भारतीय आम जनमानस के हृदय को गहरी ठेस पहुंची और मेरा पूर्णरूपेण यह मानना है की कांग्रेस के पतन के प्रमुख कारणों में ये कृत्य भी एक प्रमुख कारण है ! वोट बैंक तुष्टिकरण नीति के तहत कांग्रेस ने हिंदू राष्ट्रवादियों पर व भारत की सभ्यता संस्कृति पर जिस प्रकार से झूठे प्रहार किए उससे भारतीय जनमानस में उनके प्रति एक भावना पैदा हुई थी कि ये लोग वोट बैंक की राजनीति के लिए कुछ भी कर सकते हैं! ठीक है राजनीति में वोटों व सत्ता के लिए पहले भी कई दलों और नेताओं ने कई बार अमर्यादित कृत्य किये हैं लेकिन ये गिरावट की पराकाष्ठा थी जिसमे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए साधू,संत व सेना के अधीकारियों को निशाना बनाया गया!,हालांकि सत्ता में मदमस्त वो लोग ये  भी भूल गए थे कि जो  खेल वो खेल रहे थे वो राष्ट्र की आबादी का लगभग 90% है !

खैर, लोकसभा चुनावों में उनको अपने कृत्यों की कीमत चुकानी पड़ी और उन्हें सत्ता के बाहर का दरवाजा देखना पड़ा और भाजपा की प्रचंड बहुमत से मोदी जी नेतृत्व में सरकार बनी क्योंकि ज्यादातर राष्ट्रवादियों का रुझान भाजपा की तरफ  ही तो था ,तो उम्मीद थी कि 24 घंटे के अंदर ही जेलों में बंद निर्दोष राष्ट्रवादियों को न्याय मिलेगा व दोषियों पर कड़ी कार्यवाही होगी ! लेकिन हैरानी की बात 24 मास से ज्यादा समय बीत जाने के बाद, ये सब निर्दोष है, ये साबित होने के बाद और ऐसा  किन लोगो ने ऐसा किया था, ये मालुम होने के बाद भी ,ये राष्ट्रवादी जेलों में सड़ रहे है और जुल्म ढाने वाले राजनितिक लोग व अफसर मौज उड़ाते हुए ऐशो-आराम का लुफ्त उठा रहे हैं !  ये सब बातें क्या आम राष्ट्र-प्रेमी व्यक्ति को झकझोरने पर मजबूर नहीं कर रही हैं !

इस सम्बन्ध में मैंने कई बार सत्ता से नजदीकी रखने वाले कई मित्रों व संघठन के लोगो से बात की है ! लेकिन जवाब दिल को जलाने वाले होते है ! ठीक है, उनके साथ गलत हुआ है , उनको न्याय जल्दी मिलेगा , धीरे-2 दोषियों का इलाज होगा ,सरकार की छवि भी देखनी होती है, विपक्षी दल मुद्दा बना सकतें है सावधानी से करने की जरुरत है, ...ये सब सुनकर क्रोध भी आता है और तरस भी !

 अरे, गोली मारों सरकार की छवि को,बनाने दो विपक्ष को मुद्दा ! गलत को गलत और ठीक को ठीक कहना चाहिए ,इन बातों से छवि गिरती हो तो सौ बार गिरे ! बनता तो ये  है कि राष्ट्रवादियों पर जुल्म ढाने वालों व उनके खिलाफ षड्यंत्र रचने वाले नेताओं व् अधिकारियों को तुरंत चिन्हित और जांच कर उनके घरों से कुतों की तरह घसीट कर जेलों में ठोकें !  ताकि भविष्य में कोई भी दल ,व्यक्ति या संस्था राष्ट्रवादी लोगों का दमन करने का स्वपन में भी ख्याल न कर सके !  सत्ता की चकाचोंध में खोने की जरुरत नहीं है और न ही इसे चिरस्थायी समझने की की भूल करनी हैं ! और ये भी भूलने की जरुरत  नहीं है कि इन जैसे ही हजारों, लाखों राष्ट्र-प्रेमी लोगो की भावना, मेहनत और वोट के कारण ही हम आज सत्ता में हैं और ये नहीं रहे तो हम भी नहीं रहेंगें ! ... और ये भी समझना चाहिए कि यों ही जुल्म करने वाले आजाद घूमते रहे तो फिर कौन प्रज्ञा हिंदुत्व के लिए दहाड़ेगी ?... क्यों पुरोहित राष्ट्र के लिए गरजेगा?....किस लिए असीमानंद धर्म-जागरण करेगा ?

Monday, 18 April 2016

"काहे का शाही खानदान ?, क्या हम अभी तक गुलामी की मानसिकता से उबर नहीं पाए हैं ?

पिछले दिनों ब्रिटिश राजघराने से प्रिंस विलियम व उनकी पत्नी केट मिडल्टन जिनको मिडिया ने ब्रिटिश शाही जोड़ा करके प्रमुखता से छापा भारत आये और देश के कई जगह होकर गए हैं ! ....ठीक है, मेहमान थे और मेहमान का स्वागत भी होना चाहिए !  लेकिन जिस तरह से मिडिया व देश की प्रमुख हस्तियों ने उनके स्वागत करने व मिलने में व्यग्रता और उत्सुकता दिखाई वो वाकई सोचने पर मजबूर व हैरान करने वाली बात थी ?
     
        हमारे देश की प्रमुख हस्तियों का यह हाल था कि कोई उनको क्रिकेट की गेंद फेंककर के अपने आपको गौरवांवित महसूस कर रहा था ,तो कोई विकेटकीपिंग करके अपने को धन्य समझ रहा था!  ब्रिटिश राजघराने की इस जोड़ी के भारत आगमन पर ब्रिटिश हाई कमीशन ने दिल्ली में चाय समागम आयोजित किया था, जिसमें 500 के लगभग गणमान्य अतिथियों को दोपहर की चाय पर अपने प्रांगण में आमंत्रित किया था ! आमंत्रित की सूची में कई कैबिनेट मंत्री ,जयपुर का राजपरिवार, महाराज गज सिंह, उदयपुर का शाही परिवार ,एम जे अकबर, करन थापर इत्यादि व वरिष्ठ सांसद भी शामिल थे !हाई कमीशन के गार्डन में चाय पानी की व्यवस्था थी एक ओर जहां झुलसती गर्मी में मेहमान परेशान थे तो शाही जोड़ा मुश्किल से 10 मिनट के लिए मेहमानों से मिलने बाहर आया ! सिर्फ 10-20 अति विशिष्ट लोगों को ही रॉयल कपल से मिलने अंदर कमरे में भेजा गया !एक पूर्व विदेश मंत्री इस जोड़े के साथ अपनी सेल्फी लेना चाहते थे सूत्रों का दावा है कि जैसे ही वह महोदय सेल्फी लेने की कोशिश कर रहे थे प्रिंस और केट की सुरक्षा में तैनात उनके अंगरक्षक फौरन हरकत में आ गए और एक तरीके से उन्होंने बल प्रयोग कर दिया ! सूत्र तो बताते हैं क़ि एक कश्मीर के राजघराने की हस्ती का का परिचय ब्रिटिश हाई कमिश्नर ने कांग्रेस के राज्यसभा सांसद के तौर पर कराया तो उनको यह परिचय इतना काफी नहीं लगा ! वह चाहते थे कि प्रिंस विलियम को यह बताया जाए कि वह कश्मीर के राजा रह चुके है !
  
             मिडिया ने भी इस जोड़े के प्रचार प्रसार में दिन रात एक कर दिया !प्रिंस विलियम्स ने क्या पहना है? राजकुमारी केट मिडलटन की क्या ड्रेस है? उसने क्या गहने पहने हैं ?,इतनी छोटी छोटी चीजों को  बढ़ा चढ़ाकर के प्रस्तुत किया यह सब बातें हैरान करने वाली थी और बार-बार इस जोड़े को मीडिया शाही घराने- शाही घराने  की जोड़ी कहकर प्रचारित कर रही थी ! ब्रिटिश के लोगो की मानसिकता का तो पता नहीं लेकिन जंहा तक मेरी समझ है भारतीय इस जोड़ी को ब्रिटिश खानदान के रूप में तो स्वीकार कर सकती है लेकिन ये शाही खानदान के रूप में हमें स्वीकार्य नहीं ! शाही खानदान का भारतीय परिवेश में अलग परिभाषा है ! मेरा इरादा किसी के व्यक्तिगत जीवन में झांकना या किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना नहीं है लेकिन जो परिवार कभी संस्कारो में रहा ही न हो, जंहा रोजाना नए-2 सेक्स स्कैंडल होते हो,  जंहा नित नये शादी और तलाक  होते हों , तो उन्हें शाही खानदान कैसे माना जा सकता है?  यंहा ये भी उल्लेखनीय है कि प्रिंस विलियम की माँ डायना की जब दुखद एक्सिडेंट में मृत्यु हुई थी तो वो अपने पति नहीं अपितु नए प्रेमी जिस के साथ वो शादी करना चाहती थी , के साथ सफ़र कर रही थी !

     हाँ , यदि ये जोड़ा भारतवर्ष के किसी मित्र देश ( जिस देश ने भारत के साथ जमकर मित्रता निभा रक्खी होती ) से आया हुआ होता , और फिर उनका हमारी ये हस्तियां इतनी व्यग्रता से स्वागत करती तो बात समझ में आती ! लेकिन जिस देश ने हमको गुलाम बनाकर हमारा शोषण किया, जिस देश ने हमारे देश की आर्थिक सम्पदा का दोहन किया,जिस देश के शासनतंत्र को उखाड़ फैकने के लिए हजारो-लाखों लोगो ने अपनी जान की बाजी लगाई हो, देशभक्तों ने खून बहाया हो उस देश के अय्याश खानदान के चूजों के लिए इतना उतावला पन ,क्या ये मानसिक दिवालियापन नहीं है ? क्या ये शहीदों का अपमान नहीं है ?

       हमारे देश में एक से एक सुंदर ,योग्य  युवक,युवतियां है जिन्होंने अपने कठिन परिश्रम से देश का नाम ऊँचा किया है,  नित -रोजरोज देश के लिए दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए जवान शहीद हो रहे है , देश का किसान, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि दिन -रात मेहनत कर देश को तरक्की पर ले जाने की कोशिश कर रहे है , ये महान हस्तियां उनके प्रति इतना उतावला पैन क्यों नहीं दिखाती ?

~~~~~~~संभलो दोस्त,  संभलो !~~~~~~~~~

Saturday, 9 April 2016

जाट आरक्षण आंदोलन :- ये माजरा क्या था ?

 "हमारा हरा-भरा हरियाणा प्रदेश जिसकी पहचान देश और दुनिया में कर्म करने और फल की इच्छा न करने का संदेश देने वाली गीता-स्थली, जात- पात व छुआछात व अंधविश्वास के खिलाफ खड़े हुए आर्य समाज के गढ़,शानदार खिलाड़ी,सैनिक और उच्च कोटि का अन्न पैदा करने वाले राज्य की रही है और जो प्रदेश शान्ति और भाई-चारे का सोहार्द बनाए रखने के मामले में सारे राष्ट्र के सामने रोल मॉडल रहा हो फिर यदि जिस प्रदेश का नामकरण भी किसी जाति,क्षेत्र,वर्ग या फिर किसी भागौलिक आधार पर न होकर स्वम् भगवान् श्री हरि के आगमन (हरि का आना=हरियाणा) पर हुआ हो उस प्रदेश में एकदम जातीय आधार पर आरक्षण मांग रहे जाट आंदोलन के दौरान घटित हुई हिंसा, आगजनी,हत्या,लूट-पाट,तोड़-फोड़,जातीय विद्वेष व दंगो ने देश और दुनिया को झकझोर कर रख दिया !ऐसा लगा मानो शांतिप्रिय हरियाणा प्रदेश जैसे युद्ध के मैदान में तब्दील हो गया हो !ऐसा भयानक मंजर लगभग एक सप्ताह तक देखने को मिला! सड़के रूक गई,रेलें ठहर गई,देश और प्रदेश में यात्रा कर रहे यात्री जगह-2 फंस गए,हर शख्स की आंखों में एक अजीब सा खौफ पैदा हो गया! लगभग एक सप्ताह तक सारा प्रदेश बंधक सा बन कर रह गया !अचानक ऐसा क्या हुआ ये किसी की समझ में कुछ नहीं आया ? जगह-जगह पेड़ काटकर ट्रेलिया लगाकर,ट्रक लगा कर, रास्ते खोदकर सभी सामान्य आवा जाही वाले रास्तों पर जाट युवाओं के, वृद्धों के ,महिलाओं के झुंड के झुंड नजर आने लगे!फिर रह-रह कर सोशल मीडिया,टेलीविजन और समाचार पत्रों पर बार-बार,जगह -जगह से गोली चलने,हत्या आगजनी ,मारपीट,लूट-खसोट व विभिन्न जातियो द्वारा एक दूसरे खिलाफ मोर्चे निकालने की खबरों का क्रम शुरू हुआ ! नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं,वकीलों ,शिक्षकों आमजन व और तो और कुछ बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा भी एक दूसरे की जातियों की कमियां निकालने का काम शुरू हो गया ! ये एकदम भयावह स्तिथि थी !आंदोलन कारियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी स्थिति को संभालने के लिए सेना और अर्ध- सैनिकों बलों की टुकड़ियों को बुलाना पड़ा ! सरकार खासकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने  तुरंत सयंम व समझदारी का परिचय देते हुए व प्रदेश के मुखिया का असली किरदार निभाते हुए वार्ता के लिए जाट आंदोलन से जुड़े सभी नेताओं व् प्रतिनिधियों को समाधान के लिए मुख्यमंत्री आवास पर बुलाया !बातचीत सद्भावना पूर्ण माहौल में संपन्न हुई ! सरकार ने  सर्वमान्य हल निकालते हुए जाटों की मांग का सर्वसम्मत हल निकाला ! वार्ता में उपस्थित सभी जाट नेताओ व प्रतिनिधियों ने भी सरकार की बात का समर्थन किया व मीडिया के सामने आंदोलन कर रहे लोगो से तुरंत आंदोलन समाप्त करने की अपील की ! यंहा इस बात का उल्लेख करना भी अत्यंत आवश्यक है कि लंबे समय से जाट आंदोलन से जुड़े रहे व मुख्यमंत्री मनोहर लाल के खिलाफ कई बार विवादित ब्यान देने वाले जाट नेता हवा सिंह सांगवान ने वार्ता बैठक के बाद सरेआम मिडिया के सामने एक हैरान करने वाला ब्यान दिया कि मैंने तो मुख्यमंत्री को  भी बार्ता के दौरान बता दिया है कि अब आंदोलन हमारे हाथों से  फिसल कर नए व अनजान लोगो के हाथ में जा चूका है !  लेकिन उस समय किसी का भी ध्यान हवा सिंह सांगवान की बात पर नहीं गया हालाकि बाद के घटनाक्रम में समझ आया कि वो क्या कह रहे थे ! लेकिन आंदोलन कारियों ने जाट नेताओं व सरकार की अपील ठुकरा दी व सड़कों पर जमे रहे ! इन सबके बावजूद फिर सर्वदलीय बैठक बुलाई गई,जिसमें हरियाणा प्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टीयों के वरिष्ठ नेताओं ने भाग लिया !सभी ने सरकार के प्रयासों समर्थन किया व सभी ने (चाहे अनमने मन से ) आंदोलन को समाप्त करने की अपील करने की रस्म अदायगी की ! उस समय ऐसा लगा था कि शायदअब हालात सामान्य हो जाएंगे व आंदोलन समाप्त हो जाएगा ! लेकिन हैरान करने वाली बात ये रही कि आंदोलन समाप्त होने के बजाए आशचर्य जनक  रूप से  ओर तेज गति से उग्र हो गया !हिंसा ओर भी ज्यादा तेजी से फैलने लगी! जगह -जगह से आगजनी व मौतों की खबर तेजी से आने लगी !आंदोलन कर रहे जाटो की भीड़ भी अचानक बे-हताशा रूप से बढ़ने लगी !कई जिलों में कर्फ्यू लगने के बावजूद  भी हिंसा जारी रही ! कई जिलों में कर्फ्यू के बावजूद हालात बिगड़ते गए  व सेना और आंदोलनकारी आमने-सामने डट गए ! जातियों के टकराव जगह-जगह और तेज हो गए !सारा प्रदेश आंदोलन की गिरफ्त में आ गया! हालात इतने विस्फोटक होने लगे कि कोई भी व्यक्ति एक दूसरे की बात सुनने को तैयार ही नहीं था !ये सब कुछ इतनी तेजी से चल रहा था मानो स्क्रीन पर एक्शन से भरपूर कोई हिंदी फिल्म चल रही हो!  ये सभी की समझ से बाहर की बात थी कि जब सरकार ने जाट आंदोलन कारियों की सारी मांगें मान ही ली थी तो आंदोलन समाप्त होने की बजाए ओर अधिक उग्र कैसे हुआ !ऐसी कोनसी अदृश्य ताकत थी जो पर्दे के पीछे से प्रदेश की जनता के मध्य असहष्णुता के बीज को रोपित कर भाई- चारे और सोहार्द के माहौल में जहर भरने का षड्यंत्र रच रही थी ? यह यक्ष प्रश्न अभी तक भी बुद्धिजीवी व सामाजिक  विश्लेषकों  को कुछ न कुछ सोचने के लिए झकझोर रहा है ।              हालात की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने जिम्मेवार शासनतंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने प्रदेश के जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े हुए सभी नेताओं को वार्ता के लिए फिर से दिल्ली में बुलाया ! वार्ता में सर्वमान्य हल निकाला गया व् फिर से घोषणा की गयी क़ि हरियाणा में जाटो को आरक्षण दिया जाएगा व इसके लिए हरियाणा विधानसभा के आगामी सत्र में एक प्रस्ताव पास कराया जाएगा! वहीं दूसरी ओर जाटों को आरक्षण संविधान व कानून के दायरे में रहकर किस प्रकार से दिया जा सकता है इसके तकनीकी पहलुओं की जांच व समाधान के लिए वरिष्ट केंद्रीय मंत्री वैंकया नायडू के नेतृत्व में पांच सदस्यीय मंत्रियों की कमेटी का गठन किया! इस लेख में मै इस बहस में नहीं पडूंगा कि जाटों की आरक्षण की मांग जायज है या नहीं ? मेरी तो इतनी सी पीड़ा है कि आंदोलन में हिंसा फैला कर प्रदेश के इतने बढ़िया सामाजिक वातावरण में जहर घोलकर जाटों को बदनाम करने का षड्यंत्र किसने रचा !लेकिन थोडा सा भी सामान्य ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को इस आंदोलन से सम्बंधित घटनाक्रम की हर घटना स्वत ही बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है! मैंने भी कई बार छात्र ,सामाजिक व राजनैतिक आंदोलनो में भाग लिया है व कई आंदोलनो को बडी नजदीक से देखा है !लेकिन इस आंदोलन में जिस तेजी से घटनाक्रम पर घटनाक्रम बदलते गए ,ऐसा पहले कभीे भी किसी आंदोलन में न तो देखा न सुना ! यह शुरू से ही सर्वविदित है कि हरियाणा के जाट सामान्यता अपने भोलेपन, सरल स्वभाव,हँसी -ठिठोल्ली,तुरंत हाजिर जवाबी, स्वमं की जातीयता का स्वाभिमान लेकिन दूसरी जातियोँ का सम्मान व खड़ी बोली के लिए जाने - जाते हैं !लेकिन रातों- रात उनके मन में एकदम से ऐसी कोनसी क्रान्ति की विचारधारा ने हिलोरें मारने शुरू कर दिये कि वह सड़कों पर आ कर के मरने -मारने के लिए उतारु हो गए ? दूसरों की सहायता करने में सदैव तत्पर रहने वाले,खेलों में मैडल लाकर देश का नाम रोशन करने व देश की रक्षा में अग्रणी रहने वालों कि आँखों में रातों- रात एकदम खून कैसे उत्तर आया ये एक रहस्यमयी प्रश्न है जिसकी तह तक पहुचना अति - आवश्यक व समय की मांग है ?  हालांकि पहले भी प्रदेश में वर्षों से रह- रह कर जाट आरक्षण की मांग उठती रही है! जाट समुदाय के लोगों द्वारा समय- समय पर धरने प्रदर्शन भी होते रहे है ! एकाद छुटपुट हिंसात्मक घटनाए पहलें भी घटित हुयी हैं लेकिन इन सबके बावजूद आज तक (इस आंदोलन के होने के बावजूद भी ) हरियाणा में जाट जाति का कोई भी बड़ा व ताकतवर  गैर- राजनैतिक  नेता नहीं बन पाया है!इसका मुख्य कारण ये है कि हरियाणा एक छोटा प्रदेश है और जाट सामान्यता प्रदेश की राजनैतिक पार्टियों में मौजूद राष्ट्रीय, प्रदेश स्तरीय व स्थानीय जाट नेताओं में आस्था के चलते अलग-2 विचारधाराओं में विभक्त रहा है,अतः गैर- राजनैतिक सर्वमान्य जाट नेता के लिये हरियाणा की धरा पर स्पेस ही नहीं है इसके बावजूद प्रदेश के  अलग-अलग जिलों के जाटो  की अलग- अलग ताशीर है व सामाजिक व आर्थिक जीवन में भी भारी असमानताएं है और इसकी के चलते  वर्तमान आंदोलन से पहले कभी भी जाट समाज के किसी भी गैर- सामाजिक कार्यक्रम या आरक्षण के किसी भी आंदोलन,सम्मलेन या सैमीनार में 10,000 से ज्यादा जाटों की भीड़ इकट्ठी नहीं हुई !जाट समुदाय के ज्यादातर लोगों की आपस में रिश्तेदारियां भी इलाकों विशेष तक ही सीमित है ! फिर इस एकदम से आंदोलन में ऐसा क्या विशेष कारण  उत्पन्न हुआ कि जिसके चलते बहुसंख्या जाट एकदम सब कुछ छोड कर  आरक्षण की मांग के लिए  सड़कों पर जा पहुंचे ?                                   मैंने इस संदर्भ में जाट व अन्य जातियों के काफी प्रबुद्धजनों से इस विषय में कई बार विस्तार से तर्क - वितर्क किये ! इस विषय  में सबका अपना अपना अलग अलग नजरिया था ! किसी का मत था कि जाट समुदाय का मुख्यमंत्री प्रदेश लंबे समय से चला आ रहा था इसलिए गैर-जाट मुख्यमंत्री बनने से जाट नाराज है! किसी ने कहा की ज्यादातर जाटो की आजीविका कृषि पर आधारित है और लगातार फसलों के दाम पीट रहें है व ज्यादातर जाट छोटे किसान हैं इस कारण वे कर्ज की दलदल में फंसते जा रहे हैं इस वजह से भी जाटो में सरकार के प्रति आक्रोश है और किसी का तर्क था कि गत हुए पंचायत चुनाव में सरकार ने जो शैक्षणिक योग्यता की शर्त लगाई उस वजह से काफी सारे जाट चुनाव लड़ने से वंचित रह गए इसलिए ये सब हुआ और कई व्यक्तियों ने यह भी दलील दी कि ज्यादातर टैक्सी, जीप , ट्रक , ऑटो चलाने वाले काफी संख्या में जाट समुदाय से है और 10 साल पुराने वाहनों के बैन करने के फैसले से ये लोग नाराज है लेकिन बहुत से लोगो का ये भी कहना था चूँकि एक गैर- जाट समुदाय के सांसद ने लगभग एक साल से लगातार जाट जाति पर सार्वजानिक मंचों से कटाक्ष किये इसलिये ये सब कुछ हुआ !ये सब या इनमे से कोई एक या अन्य इस आंदोलन के सहायक कारण हो सकते हैं लेकिन इनमे से कोई भी एक कारण ऐसा नहीं है जिससे इतना बड़ा उग्र हिंसात्मक आंदोलन हो सके !अगर ये सब कारण मान भी लिए जाएँ तो इस आंदोलन को अंदरखाते किसने एकजुट करके हवा दी? जाट नेताओं के हाथ से कैसे एकदम आंदोलन निकल गया ? कैसे कांग्रेस और इनलो पार्टी के एक दूसरे के कट्टर विरोधी होने के बावजूद जाट कार्यकर्ता दलों की दीवार  तोड़कर एकसाथ धरनों पर बैठ गए ? इन सब बातों का गहराई से विश्लेषण की आवश्यकता है बाकि सच्चाई इस मामले में ज्यादा देर तक छुप नहीं पाएगी देर- सबेर सामने आ ही जायेगी बल्कि कुछ तो सामने आयी भी है ! पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के राजनितिक सलाहकार प्रो वीरेंद्र का ,पूर्व गृहमंत्री सुभाष बत्रा का एक आडियो टेप व रोशन लाल आर्य ( तीनों कांग्रेस के )का वीडियो टेप उजागर हुआ था, जिसमे वो आंदोलन बारे विवादित ब्यान देते हुए सुने गए है और प्रो वीरेंद्र तो जेल में इसी मामले रह कर बाहर जमानत पर आये है ये तो प्यादे भर है ,मास्टर माइंड ताकतों का पर्दाफाश होना तो अभी बाकी है ? जो जाट समुदाय के लोग अपने आरक्षण के लिए आन्दोलनरत थे उनमे से ज्यादातर को तो शायद ये पता भी भी नहीं होगा कि जाने-अनजाने में वे किन शरारती,अराजक व सत्तालोलुप ताकतों के द्वारा दुरपयोग हो गए हैं? जाट समुदाय के ज्यादातर सामान्य लोग ये तो समझ भी गए है व खुले मन से स्वीकार भी करने लगे है कि लगभग 10 वर्षों तक सत्ता रहने वाली कांग्रेस और भूपेंद्र हुड्डा ने जाटों को आरक्षण के नाम पर केवल छला है!ऐन चुनाव के मौके पर इन लोगो ने जाट आरक्षण का नकली झुन-झना जाटों के हाथो में पकड़ाया था! बिना किसी आधार पर दिया ये झुन-झना सुप्रीम कोर्ट में जाते ही ताश के पतों की तरह बीखर गया ! क्या कांग्रेस ने सत्ता से जाते-जाते ये खतरनाक खेल इसी दिन के लिए तो नहीं खेला था ?          देश के साथ - साथ हरियाणा में भी भ्र्ष्टाचार रहित लोकप्रिय सरकार मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रही थी, सरकार के बल पर गुंडागर्दी का खेल खेलने वाले लोगो के दिन प्रदेश से लद गए हैं,प्रदेश में नोकारियों,विकास व् क्षेत्रवाद में भेदभाव व भ्र्ष्टाचार के आरोप पुराने जमाने की बातें हो चली हैं और आमजन सरकार की नीतियों से लगातार प्रभावित हो रहे थे,विपक्ष के पास काफी कोशिशो के बावजूद सरकार के खिलाफ ढ़ेड साल में कोई एक भी ठोस मुद्दा हाथ नहीं आ सका है ! पूर्व सरकारों में प्रदेश से पलायन कर गये उधोगपति वापिस लौटने व विदेशी निवेशकों ने हरियाणा में निवेश करने की रूचि दिखानी शुरू कर दी थी!इसी को लेकर मार्च के पहले सप्ताह में गुड़गांव में हरियाणा हैपनिंग का कार्यक्रम पहले से ही तय था! प्रदेश के अन्य जिलों के साथ-साथ कांग्रेस के प्रभाव वाले खरखोदा  ( सोनीपत)में बहुत बड़ा निवेश होने की सहमति पहले से ही बन चुकी थी! हिंसक जाट आरक्षण आंदोलन का सच क्या है ?  कंही आंदोलन की आड़ में  सत्ता और वोट बैंक के भूखे लोग अपनी घिनोनी साजिशों में कामयाब तो नहीं हो गए ? देश के साथ - साथ हरियाणा में भी भ्र्ष्टाचार रहित लोकप्रिय सरकार मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रही थी, सरकार के बल पर गुंडागर्दी का खेल खेलने वाले लोगो के दिन प्रदेश से लद गए हैं , प्रदेश में नोकारियों,विकास व् क्षेत्रवाद में भेदभाव व भ्र्ष्टाचार के आरोप पुराने जमाने की बातें हो चली हैं और आमजन सरकार की नीतियों से लगातार प्रभावित हो जनता की लगातार सरहाना मिल रही थी ,हो सकता है ये सब भी कई विपक्षी लोगो को बहुत अट -पटा लगा हो!इसका ताजा उदहारण शेरशाह सूरी मार्ग पर  स्थित मुरथल (सोनीपत ) में आंदोलन समाप्ति के तुरंत बाद मिडिया का एक विशेष वर्ग द्वारा न्यूज़ चैनेल व समाचार पत्रों में कई दिनों तक एक दर्जन महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार व गैंग- रेप होने की आशंका की खबरें चलाकार समाज में सनसनी फैलाने में सक्रिय हो गया ! ये भी  सरकार को  बदनाम व अस्थिर करने की  साजिश की कोशिश तो नहीं थी? आखीरकार सरकार के सही समय पर सही निर्णयों के चलते मिडिया के इस वर्ग का ये तमाशा भी पीपली लाइव फ़िल्म की तरह एक मजाक का ही विषय बन कर रह गया !         जाट आंदोलन के दौरान हुई हिंसा व आराजकता से  हरियाणवी  समाज के सौहार्द व भाईचारे को तो जबरदस्त ठेस पहुंची ही है साथ में सरकारी और निजि सम्पतियों को भी भारी नुक्सान हुआ है !कई स्थानों पर लोगो की दुकानें ,मकान व प्रतिष्ठान पूरी तरह जल कर तबाह हो चुके है,हजारों पेड़ कटे हैं , कई जिलों में जगह-जगह सड़के तोड़ दी गई,रेल की पटरियां उखाड़ दी गई,सैंकड़ों बसें,ट्रक व कारों को आग के हवाले कर जला  दिया गया !30 के लगभग लोगो की जाने गयी व सैकड़ों घायल हुए ! अभी भी प्रदेश की जनता निम्नलिखित बिंदुओं को न तो समझ पा रही हैं और न ही पचा पा रही हैं ?       1.जाट आरक्षण के समर्थन में जाटो के पास कोई भी करिश्माई या बड़ा नेता नहीं था फिर अचानक से एकदम इतना बड़ा आंदोलन कैसे खड़ा हो गया ? जाट आंदोलन देश प्रदेश के किसी भी स्थान पर किसी भी जाट नेता के हाथ में नहीं था तो फिर यह आंदोलन सारे प्रदेश में एक साथ इतने सुचारु तरीके से कैसे चल रहा था,और जब सरकार ने शुरू में ही सारी मांगे मान ली थी तो फिर आंदोलन समाप्त होने की बजाए उग्र और हिंसात्मक क्यों हुआ ?      2. जब रोहतक की हिंसा के कारण हरियाणा जल रहा था उस समय कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा अपने गढ़ रहे रोहतक में हिंसा की आग शांत करने क्यों नहीं गए ? जबकि यही वो रोहतक शहर था जिसने उनके समर्थन में भारी मतदान कर तीन बार चौ देवीलाल को हराया था !और जब जाट आंदोलन समाप्ति की ओर था तब तब वो शांति और भाईचारे की अपील का स्वांग करने के लिए जंतर मंतर पर ही धरने पर क्यों बैठे,अपने गृह जिले में क्यों नहीं ? और जब उनके पूर्व राजनीतिक सलाहकार आंदोलन के षड्यंत्र में फंस गए तो ये क्यों कहा कि मेरा उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है ? 3. हरियाणा के वित्तमंत्री कैप्टेन अभिमन्यु का मकान को आंदोलन कारियों ने किस वजह से आग लगाई?     4..आज तक हरियाणा में अनेकों बार जायज - नाजायज मांगों के समर्थन में अनेकों धरने प्रदर्शन होते रहे हैं लेकिन उनकी मांगों के खिलाफ  पहले कभी -किसी भी दूसरे पक्ष या वर्ग ने मोर्चे या जलूस नहीं निकालें है तो फिर अचानक से आंदोलन के दौरान जगह -2 जाटों के खिलाफ क्रमबद्ध  मोर्चे व जलूस कैसे निकले ?     5.  जाट आंदोलन ठंडा होते ही एकदम से लगभग सभी न्यूज़ चैनल व समाचार पत्रों में मुरथल सोनीपत के पास लगभग एक दर्जन महिलाओं के साथ सामूहिक गैंग रेप होने की आशंका वाली झूठी खबरें कैसे छाई रही ? जबकि इस सम्बन्ध में किसी भी एक भी महिला या उसके रिश्तेदार ने  न तो पुलिस में रिपोर्ट दी और न ही किसी  मीडिया या अन्य को !    6. सोशल मीडिया पर अचानक कुछ मुस्लिम जाट आंदोलनकारियों की वह कुछ जाट मुस्लिमों की एकदम से प्रशंसा कैसे करने लग गए ?  व मुलायम सिंह यादव के सबसे विश्वसनीय व भाजपा के धुर विरोधी कट्टर मुस्लिम नेता आजम खान का आंदोलन के समाप्त होने के बाद यह ब्यान  कैसे आया कि भाजपा सरकार ने आंदोलन के दौरान जाटो पर बहुत  अत्याचार किए हैं जबकि आजम खान का हरियाणा की राजनीति या यंहा के जाटो से दूर दूर का भी नाता नहीं है ?    7..  बसपा सुप्रीमो मायावती जो की  सदैव अन्य जातियों के द्वारा आरक्षण मांगने खिलाफ रही है उसने एकदम से जाट आरक्षण की मांग को समर्थन क्यों दे दिया ?      यह कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका जवाब आज हरियाणा प्रदेश का बच्चा बच्चा मांग रहा है ! समय की मांग  है कि  आज प्रदेश में हर जाति और वर्ग के व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन बखूबी करना होगा !सभी हिन्दू सगे भाई है और जाति से बड़ा भाईचारा है इस भावना को अपनाकर आगे चलना होगा!जाट समाज को अहसास करना होगा कि ऐसे आरक्षण का  क्या लाभ जिसमें अपने ही प्रदेश के अन्य भाईयों की भावनाओं के सम्मान को ठेस पहुंची हो? गैर-जाट समाज को भी अपना मन टटोलना होगा कि कोई पाकिस्तान के लोग आंदोलन थोड़े ही कर रहे थे तो फिर हम एक दम इतने उद्धेलित कैसे हो गए? क्या अब जाट समाज को भी ठंडे दिमाग से यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि उनके आंदोलन की आड़ में किन-किन ताकतों ने अपने स्वार्थ की पूर्ति पूरी कर ली  हैं ? क्या हरियाणा किसी एक जाति विशेष के योगदान के कारण ही इस शिखर तक पहुंच पाया है ?क्या हरियाणा के निर्माण मे, विकास में,तरक्की में व् पहचान मे सभी जातियों का किसी न किसी रूप में योगदान नहीं है ? आज समय सभी जातियों के द्वारा खुले दिमाग से विचार करने का समय है!हम सभी इस मां भारती के लाडले सपूत हैं और छोटे-छोटे स्वार्थ हमको एक दूसरे से अलग नहीं कर सकते इसी भावना से कार्य करने की आवश्यकता है !      मेरा हरियाणा जिस की पावन धरा से स्वंम भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म का संदेश सारी दुनिया को दिया हो वह इतना कमजोर नहीं कि वो चंद सत्ता की भूखी ताकतों के सामने असहाय हो करके अपना सामाजिक ताना बाना समाप्त कर ले   ! भाई से भाई को लड़ाने का षड़यंत्र रचने  वाली ताकतों को यह समझ लेना चाहिए की हरियाणा अन्याय ,षड्यंत्र व् अत्याचारों के खिलाफ हुए परास्त हुए लोगो के महाभारत के युद्ध की भी भूमि  है!मुझे पूरा यकीन और विश्वास है  कि सभी  जातियों के लोग " हरियाणा एक हरियाणवी एक "  का नारा मजबूत करते हुए पिछले दुखद वह भयानक घटनाओं और दृश्यों को पीछे छोड़ते हुए फिर से उठ खड़े होंगे !षड्यंत्रकारियों के चेहरों से नकाब हटेंगे, ऐसा मेरा दृढ़  विश्वास है !