काफी लंबी जांच-पड़ताल के बाद पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के बारे में माननीय उच्चतम न्यायालय का निर्णय आया कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ऊपर मकोका लगाने का कोई भी कारण मौजूद नहीं है ! स्वामी असीमानंद के मामले में भी इतनी लंबी ट्रायल के बावजूद कुछ नहीं निकला है ! और अब कर्नल पुरोहित को भी जांच एजेंसियों से क्लीन चिट मिलने से ये तो स्पष्ट हो गया है कि ये राष्ट्रवादी निर्दोष थे और इनको एक षड्यंत्र के तहत झूठे मामले बना कर फंसाया गया था ! ये सब सत्ता का दुरपयोग कर मानवीय अधीकारों को निर्ममता से कुचलने का मामला तो है ही साथ ही इससे हमारे देश की सुरक्षा व जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर भी भयंकर प्रश्नचिंह लगा है और साथ में इसे भारतीय लोकतंत्रीय व्यवस्था को भी दागदार किया है ! इस मामले ने यह सिद्ध कर दिया है कि एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार भी यदि गलत नीति और नीयत पर चलने लगे तो वह अधिनायकवादी तरीके से स्थापित हुई सरकार से भी क्रूर और भयंकर साबित हो सकती है !
शुरुआत में जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को फसाया गया तो यह प्रथम दृष्टया ही एक निर्दोष मामला लग रहा था ! हालांकि मैं स्वयं इससे पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को न तो जानता था और न ही मैंने कभी उनका नाम सुना था !लेकिन जिस तरीके और उत्सुकता से तत्कालीन यूपीए सरकार ने उनको फसाया, जिस तरीके से पूरे जोर-शोर से प्रचारित करके उनके उपर मकोका लगाया, उसी समय आम जन को यह लगने लगा था कि कहीं ना कहीं दाल में कुछ काला है ! प्रज्ञा ठाकुर का कसूर केवल मात्र इतना था कि वह राष्ट्रवाद की प्रखर पुरोधा थी ! हैरानी की बात तो ये थी कि उनके ऊपर सारे देश में इससे पहले कोई भी अपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं था और न ही उनका किसी गलत संगठन से जुड़ाव रहा था, उसके बावजूद भी उनके ऊपर मकोका लगाकर जेल में ठूस देना व उनके ऊपर जेल में अमानवीय अत्याचार करना, बीमार होने के बावजूद भी उचित इलाज की व्यवस्था ना करना, जेल के अंदर ही दूसरे खूंखार कैदियों के साथ उनको रखना व उनसे पिटाई करवाना, जेल कर्मी और पुलिसकर्मियों द्वारा अभद्र भाषा का प्रयोग कर दुर्व्यवहार करना ये सब उनको मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ने का ही एक आपराधिक कृत्य था !देश का कोई भी सभ्य नागरिक यह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा कौनसा भयंकर कृत्य साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने किया है जिस कारण से उनको इतनी बड़ी सजा दी जा रही है !मकोका आमतौर पर उन खूंखार आतंकवादियों पर लगाया जाता है जिनके बारे में यह आम धारणा प्रचलित है कि ये व्यक्ति राष्ट्र और समाज के लिए घातक है ! यंहा इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि मकोका क़ानून के तहत न जमानत मिल सकती है और न ही गिरफ्तार किये गए व्यक्ति के खिलाफ सबूत दिखाने जरुरी है यानि बिना सबूत दिखाए व्यक्ति को कितने ही दिन जेल में रखा जा सकता है ! मकोका लगाने के बावजूद भी तत्कालीन सरकार की जांच एजेंसियां कोई भी ठोस सबूत न तो सार्वजनिक तौर पर और न ही किसी न्यायालय में पेश कर पाई !यह सब बातें आम जनमानस को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रही थी!
स्वामी असीमानंद को समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट के आरोप में जेल में ठूस दिया गया !स्वामी असीमानंद की आयु और उनके चरित्र को देखते हुए भारतीय समाज का कोई भी समझदार व्यक्ति यह कतई मानने के लिए तैयार नहीं था कि इस उम्र का व्यक्ति जिसने अपनी सारी जिंदगी समाज सुधार के लिए, समाज के कल्याण के लिए लगा दी हो वह यात्रा कर रहे रेल यात्रियों को मारने का षड्यंत्र भी रच सकता है ! हाँ स्वामी असीमानंद जी ने एक अपराध तो किया था कि उन्होंने हिंदुओं के लिए शबरी-कुम्भ का आयोजन किया था जिसमे लगभग तीन लाख हिन्दु जिनको ईसाई-मशीनरीयों ने बहकाकर -फुसलाकर ईसाई धर्म में शामिल कर लिया था को दोबारा हिन्दू धर्म में शामिल किया था ! ईसाई- मशीनरियों के सालों के षड्यंत्र को नेस्तेनाबुद् करने का अपराध तो स्वामी जी ने किया था और ईसाई- मशीनरियों की योजना पुत्री सोनिया गान्धी की पार्टी ये सब कैसे सहन कर सकती थी !उसके बाद सेना में कार्यरत राष्ट्रवादी अधिकारियों का मनोबल तोड़ने हेतु कुछ दिनों बाद कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार किया गया और उन पर भी प्रखर हिंदू राष्ट्रवादी होने वह आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया! तब तक भी यह सारा माजरा किसी की समझ में नहीं आ रहा था तभी टीवी के ऊपर तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम और कांग्रेस के वोटबैंक तुष्टीकरण के नए चेहरे दिग्विजय सिंह रोजाना जब "हिंदू आतंकवाद" -"हिंदू आतंकवाद "शब्द का प्रयोग करने लगे तो सारा मामला देश की जनता के समझ में आ गया कि इन राष्ट्रवादियों को जेल में ठूसने का असली प्रयोजन क्या था !
क्या वोटों की खातिर राजनीती इतनी भी गिर सकती है ,इसका सर्वोत्तम उदाहरण उस समय की तत्कालीन कांग्रेस नीत यू पी ए सरकार ने प्रस्तुत किया था !चंद वोटों और सत्ता की निरन्तरता के लिए भगवा को ही आतंकवाद के साथ नत्थी कर दिया जाए ! "भगवा आंतकवाद '" शब्द का ईजाद करके क्या उन लाखों शहीदों व बलिदानियों का अपमान नहीं किया गया जिन्होंने इस पवित्र भगवा की आन- बान और शान के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी ! सत्ता के नशे में चूर मदमस्त शासकों ने यह जरा भी गौर नहीं किया वो जाने अनजाने में भारतीय संस्कृति और त्याग व बलिदान की भावना के प्रतीक भगवा पर कालिख पोत कर कितना बड़ा जघन्य अपराध कर रहे हैं ! इससे भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी एक बहुत बड़ा प्रश्नचिंह लगा कि सत्ता में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधि भी यदि अपनी ओछी मानसिकता पर आ जाएं तो वो अधिनायक तंत्र को भी वह माफ कर सकते हैं !इस देश में ऎसे हालात पैदा किए गए और एक समय ऐसे लगने लगा कि यह सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई तानाशाह सरकार है और जिस तानाशाही पूर्ण तरीके से उन्होंने वोट की खातिर हिन्दू राष्ट्रवादियों पर वार करना शुरू किया ,उससे भारतीय आम जनमानस के हृदय को गहरी ठेस पहुंची और मेरा पूर्णरूपेण यह मानना है की कांग्रेस के पतन के प्रमुख कारणों में ये कृत्य भी एक प्रमुख कारण है ! वोट बैंक तुष्टिकरण नीति के तहत कांग्रेस ने हिंदू राष्ट्रवादियों पर व भारत की सभ्यता संस्कृति पर जिस प्रकार से झूठे प्रहार किए उससे भारतीय जनमानस में उनके प्रति एक भावना पैदा हुई थी कि ये लोग वोट बैंक की राजनीति के लिए कुछ भी कर सकते हैं! ठीक है राजनीति में वोटों व सत्ता के लिए पहले भी कई दलों और नेताओं ने कई बार अमर्यादित कृत्य किये हैं लेकिन ये गिरावट की पराकाष्ठा थी जिसमे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए साधू,संत व सेना के अधीकारियों को निशाना बनाया गया!,हालांकि सत्ता में मदमस्त वो लोग ये भी भूल गए थे कि जो खेल वो खेल रहे थे वो राष्ट्र की आबादी का लगभग 90% है !
खैर, लोकसभा चुनावों में उनको अपने कृत्यों की कीमत चुकानी पड़ी और उन्हें सत्ता के बाहर का दरवाजा देखना पड़ा और भाजपा की प्रचंड बहुमत से मोदी जी नेतृत्व में सरकार बनी क्योंकि ज्यादातर राष्ट्रवादियों का रुझान भाजपा की तरफ ही तो था ,तो उम्मीद थी कि 24 घंटे के अंदर ही जेलों में बंद निर्दोष राष्ट्रवादियों को न्याय मिलेगा व दोषियों पर कड़ी कार्यवाही होगी ! लेकिन हैरानी की बात 24 मास से ज्यादा समय बीत जाने के बाद, ये सब निर्दोष है, ये साबित होने के बाद और ऐसा किन लोगो ने ऐसा किया था, ये मालुम होने के बाद भी ,ये राष्ट्रवादी जेलों में सड़ रहे है और जुल्म ढाने वाले राजनितिक लोग व अफसर मौज उड़ाते हुए ऐशो-आराम का लुफ्त उठा रहे हैं ! ये सब बातें क्या आम राष्ट्र-प्रेमी व्यक्ति को झकझोरने पर मजबूर नहीं कर रही हैं !
इस सम्बन्ध में मैंने कई बार सत्ता से नजदीकी रखने वाले कई मित्रों व संघठन के लोगो से बात की है ! लेकिन जवाब दिल को जलाने वाले होते है ! ठीक है, उनके साथ गलत हुआ है , उनको न्याय जल्दी मिलेगा , धीरे-2 दोषियों का इलाज होगा ,सरकार की छवि भी देखनी होती है, विपक्षी दल मुद्दा बना सकतें है सावधानी से करने की जरुरत है, ...ये सब सुनकर क्रोध भी आता है और तरस भी !
अरे, गोली मारों सरकार की छवि को,बनाने दो विपक्ष को मुद्दा ! गलत को गलत और ठीक को ठीक कहना चाहिए ,इन बातों से छवि गिरती हो तो सौ बार गिरे ! बनता तो ये है कि राष्ट्रवादियों पर जुल्म ढाने वालों व उनके खिलाफ षड्यंत्र रचने वाले नेताओं व् अधिकारियों को तुरंत चिन्हित और जांच कर उनके घरों से कुतों की तरह घसीट कर जेलों में ठोकें ! ताकि भविष्य में कोई भी दल ,व्यक्ति या संस्था राष्ट्रवादी लोगों का दमन करने का स्वपन में भी ख्याल न कर सके ! सत्ता की चकाचोंध में खोने की जरुरत नहीं है और न ही इसे चिरस्थायी समझने की की भूल करनी हैं ! और ये भी भूलने की जरुरत नहीं है कि इन जैसे ही हजारों, लाखों राष्ट्र-प्रेमी लोगो की भावना, मेहनत और वोट के कारण ही हम आज सत्ता में हैं और ये नहीं रहे तो हम भी नहीं रहेंगें ! ... और ये भी समझना चाहिए कि यों ही जुल्म करने वाले आजाद घूमते रहे तो फिर कौन प्रज्ञा हिंदुत्व के लिए दहाड़ेगी ?... क्यों पुरोहित राष्ट्र के लिए गरजेगा?....किस लिए असीमानंद धर्म-जागरण करेगा ?

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